प्रकृति माँ और उसके पाँच बच्चों की यह मनमोहक कहानी आपको जीवन के पंचतत्वों से परिचित कराती है। समीर, अग्नि, पृथ्वी, आकाश और जल - हर बच्चा जीवन के एक अनोखे चरण और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक है। इस रंगीन यात्रा में जानें कैसे संतुलन ही स्वास्थ्य है और असंतुलन ही रोग।
शीर्षक: प्रकृति माँ और उसके पाँच बच्चे भाषा: हिंदी (देवनागरी लिपि) शैली: भारतीय पारंपरिक चित्रकला (storybook illustration), बच्चों की किताब जैसी रंगीन और सरल शैली। कथा का सार: प्रकृति माँ का साम्राज्य बारह महीनों का था। उसने अपने पाँच बच्चों को बुलाया और उन्हें अलग-अलग राज्य (महीने), सिंहासन (शरीर के अंग), रंग, स्वाद, तन्मात्रा और मित्र दिए। हर बच्चा जीवन के एक चरण का प्रतीक है। 📖 दृश्य और चित्रण निर्देश प्रकृति माँ का दरबार चित्र: प्रकृति माँ एक राजसी दरबार में बैठी हैं, चारों ओर बारह महीनों का प्रतीक (फूल, ऋतु, चक्र)। टेक्स्ट: “प्रकृति माँ ने अपने साम्राज्य के महीनों को पाँच बच्चों में बाँट दिया।” समीर (वायु) चित्र: हरे वस्त्र पहने नटखट बालक, हाथ में पवन का घेरा, सिंहासन यकृत-पित्ताशय का प्रतीक। टेक्स्ट: “फाल्गुन-चैत्र उसका राज्य था। 0–12 वर्ष तक का समय उसे मिला। उसकी तन्मात्रा त्वचा थी। शनि, राहु और केतु उसके मित्र थे।” अग्नि (पावक) चित्र: लाल-नारंगी वस्त्रों में योद्धा युवती, अग्नि की ज्वाला से घिरी, सिंहासन हृदय-छोटी आंत। टेक्स्ट: “ज्येष्ठ-आषाढ़ उसका राज्य था। 13–30 वर्ष तक का समय उसे मिला। उसकी तन्मात्रा नेत्र थी। मंगल और सूर्य उसके मित्र थे।” पृथ्वी (क्षिति) चित्र: पीले वस्त्रों में धैर्यवान पुत्री, हाथ में अन्न और मिट्टी, सिंहासन आमाशय-प्लीहा। टेक्स्ट: “भाद्रपद-आश्विन उसका राज्य था। 31–45 वर्ष तक का समय उसे मिला। उसकी तन्मात्रा जिह्वा थी। बुध उसकी मित्र थी।” आकाश (गगन) चित्र: सफेद-भूरे वस्त्रों में साधु, ध्यानमग्न, पीछे तारों भरा आकाश, सिंहासन फेफड़े-बड़ी आंत। टेक्स्ट: “मार्गशीर्ष-पौष उसका राज्य था। 46–60 वर्ष तक का समय उसे मिला। उसकी तन्मात्रा कान थी। गुरु उसका मित्र था।” जल (पानी) चित्र: नीले वस्त्रों में वृद्ध पुरुष, हाथ में जल का कलश, सिंहासन गुर्दे-मूत्राशय। टेक्स्ट: “पौष-माघ उसका राज्य था। 61–100 वर्ष तक का समय उसे मिला। उसकी तन्मात्रा जीभ थी। शुक्र और चंद्र उसके मित्र थे।” समापन दृश्य चित्र: पाँचों बच्चे अपने-अपने राज्य और सिंहासन पर बैठे हैं, प्रकृति माँ मुस्कराती हुई देख रही हैं। टेक्स्ट: “जब सब संतुलन में होते हैं, तो प्रकृति माँ आनंदित होकर मुस्कराती है। यही है पंचतत्व का रहस्य — संतुलन ही स्वास्थ्य है, असंतुलन ही रोग।”